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रानी इंद्र मति को कबीर परमेश्वर द्वारा शरण में लेना

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कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं सतयुग में  सत सुकृत नाम से  द्वापर में  करुणा में नाम से त्रेता में  मुनेंद्र नाम से कलयुग में  कबीर नाम से  इस प्रकार परमात्मा  अपने भक्तों को  शरण में लेते हैं  जैसे Iद्वापरयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का करूणामय नाम से प्राकाट्य परमेश्वर कबीर (कविर्देव) द्वापर युग में करूणामय नाम से प्रकट हुए थे। उस समय एक वाल्मीक जाति में उत्पन्न भक्त सुदर्शन सुपच (अनुसुचित जाति का) उनका शिष्य हुआ था। इसी सुदर्शन जी ने पाण्डवों की यज्ञ सफल की थी। जो न तो श्री कृष्ण जी के भोजन करने से सफल हुई थी, न ही तेतीस करोड़ देवताओं, अठासी हजार ऋषियों, बारह करोड़ ब्राह्मणों, नौ नाथों, चैरासी सिद्धों आदि के भोजन खाने से सफल हुई थी। भक्त सुदर्शन वाल्मीक पूर्ण गुरु जी से वास्तविक तीन मंत्र प्राप्त करके सत साधना गुरु मर्यादा में रहते हुए कर रहा था। द्वापर युग में इन्द्रमति को शरण में लेना द्वापरयुग में चन्द्रविजय नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी इन्द्रमति बहुत ही धार्मिक प्रवृति की औरत थी। संत-महात्माओं का बहुत आदर किया करती थी। उ...