ब्रह्मचारी रहना कोई भक्ति मार्ग नहीं
🌿 *ब्रह्मचारी जीवन बिताने मात्र से मुक्ति नहीं होती!* 🌿 सुकर्मी पतिब्रता के अंग का सारांश :- दुर्वासा के ये वचन सुनकर परमात्मा जी हँसने लगे और बोले कि ऋषि! तू ज्ञानहीन है। अंबरीष के दरबार में झगड़ा क्यों किया? अंबरीष राजा तो पूर्ण रूप से मेरे में समर्पित है। सत्य वक्ता है। हे दुर्वासा! तुम तो ज्ञान के वाद-विवाद करने वाले महिमा के भूखे फिर रहे हो। अंबरीष को निरगुण तथा सरगुण दोनों प्रकार की साधना का ज्ञान है। हे ऋषि देव! वे उस सर्व ज्ञान को अपने (उर) हृदय में छिपाऐ हुए है। कोई जानना चाहता नहीं तो किसको भेद बताएँ? हे ऋषि! तुम शीघ्र अंबरीष के दरबार में जाओ। तुम्हारा सब अज्ञान अंधेरा समाप्त हो जाएगा। तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। हे ऋषि दुर्वासा! तुम अंबरीष के दरबार में जाकर उनके चरणों में गिरो। वे संकट के मोचन करने वाले हैं। अचला के अंग की वाणी का सारांश :- संत गरीबदास जी बता रहे हैं कि दुर्वासा कैसे बच सकता था? वह तो एक महान आत्मा अंबरीष का चोर था यानि अंबरीष के यथार्थ ज्ञान को सुनकर भी अपने अहंकार का प्रदर्शन किया। वह तो परमेश्वर जी बीच में आ गए, अन्यथा सुदर्शन चक्र तो बहुत शक्तिशाली है।...