संतो की शिक्षा
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सतगुरु देव जी को कोटि-कोटि प्रणाम ।
सभी भक्त आत्माओं को सत् साहेब।
सतगुरु देव जी का अंदर जेल से बार-बार एक ही सन्देश आता है। सभी भक्त मिल-जुल कर सेवा करें, प्रेम से रहे और नियम मर्यादा में रह कर अपनी भक्ति करते रहे।
यह समय बड़ा ही अनमोल है व लंबे समय के बाद आया है। इसको व्यर्थ न गवाए। अगर अबकी बार चूक गए तो सदा-सदा के लिए पछताना पड़ेगा, सतगुरु गरीब दास जी ने अपनी अमृत वाणी में बोला है-
कल्प कोटि युग बितिया, हम आये तिस बेर। गरीब दास जुलाहा कहै, देने भक्ति की टेर।।
गरीब दास जी महाराज उपरोक्त वाणी में समझा रहे है, यह भक्ति मुक्ति का समय एक करोड़ कल्प युग के बाद मिला है।
चारों युग सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग (जिनकी आयु 4320000 वर्ष )है, जब ये चारों युग2016 बार बीत जाते है। तब एक कल्प कहलाता है। ऐसे करोड़ कल्प के बाद कबीर परमेश्वर जी हमें काल के जाल से निकालने के लिए सतयुग से आने प्रारंभ हुए है। आप सभी भक्तों ने सतगुरु रामपाल जी के अमृत वचनों में सुना है। काल ने सतयुग में साहेब कबीर से वचन मांगे थे, तीन युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर) में थोड़े जीव छुड़ा कर सतलोक ले जाना, जब कलयुग आये जितने जीव मर्ज़ी ले जाना।
बंदी छोड़ कबीर साहेब जी जब 600 वर्ष पहले आये थे तब उपर काल से भेंट हुई तो काल ने कहा था कि जाओ ज्ञानी नीचे, वहाँ आपकी कोई नही सुनेगा, मैंने सभी जीवों को भर्मित कर दिया है सब आपका विरोध करेंगे, ऐसा ही हुआ तब साहेब ने काल से इस समय के लिए बोला था कि अपना संत भेजुंगा जो उनसे उपदेश लेकर मर्यादा में रह कर भक्ति करेगा वह संत सब को सतलोक लेकर जायेगा।
तब कबीर साहेब से काल ने कहा था आप एक संत भेजोगे, उससे पहले अनेक संत भेज कर सभी को भर्मित कर दुंगा, एक आत्मा को भी पार नहीं होने दुंगा और जीवों को नाना विधि से भर्मित करके अपने जाल में फंसा के रखूँगा।
करोड़ कल्प से पहले कबीर साहेब जी 70 युग लगातार काल के इस लोक में भक्ति मार्ग बताने के लिए आते रहे, एक भी जीव सतलोक में नहीं गया। हमने जो भी दान, सेवा, सिमरण किया उसका फल साथ-साथ मांगते गए और खाली होकर यहीं लख चौरासी में जाते रहे और काल जाल में फंस के रह गए।
गरीब, सत्तर युग हमने ज्ञान दिया, जीव न समझा एक।
घरि-घरि फिरे धरे कबीरा भेख।।
काल का जाल न-1, नाम खंड करवाना
न-2, काम, क्रोध, मोह, अंहकार में उतावले रखना।
न-3, मान बड़ाई, न-4, राग-द्वेष पैदा करना
न-5, दान, पुण्य सेवा से दूर करना
न-6, निंदा
न-7, श्राप
न-8, वरदान मांगना आदि।
वैसे तो उपरोक्त सभी विकार भक्ति मुक्ति में बाधा होते है परन्तु सबसे ज्यादा बाधक निंदक(निंदा करने वाला) गुरु द्रोही व आन उपासना हैं।
निंदा की हानि:- कबीर साहेब की वाणी
1- तिनका कबहु न निंदिये, पैरो तले होये।
उड़ आँख गिर जाये, पीर घनेरी होये।।
2- एक निंदक के सिर पर हज़ार पापी का भार बिना मतलब ठाये, दुनिया की बेगार।
3- निंदक नेड़े रखिये, आँगन कुटी छवाय।
भजन पानी बिन साबुन के, निर्मल करे स्वभाव।।
4 - निंदकमेरा मत मरो, मुझसे बसो न दूर।
गंदगी साफ़ किया करे, गाँव गोरवे सुवर।।
वाणी न-2 का भावार्थ
अगर घास का छोटा-सा टुकडा आपके पाँव के नीचे पड़ा हुआ है, उसकी भी निंदा नही करनी चाहिये यदि वह टुकड़ा हवा में उड़ कर आपकी आँख में गिर जाये तो बहुत पीड़ा होगी।
वाणी न- 2= निंदा करने वाले पर उतना ही पाप लगता है, जितना पाप एक हज़ार पापी सारी जिंदगी में पाप करते है और निंदक बिना वजह के निंदा करके अपने ऊपर पापों का भार ओढ़ लेता है
वाणी न-3 कबीर साहेब कहते है कि निंदा करने वाले की कुटिया अपने घर के आँगन में बना दो ताकि वह आपकी निंदा करके आपके पाप कर्म अपने सिर पर लेता रहे और आप बिना साबुन व पानी के निर्मल हो जाये।
वाणी न-4
मेरे निंदक की मौत नहीं होनी चाहिएऔर न ही मेरे घर से दूर होना चाहिये ताकि मेरी बुराई करके मेरे पाप कर्मो को साफ़ कर दे जैसे सुवर टट्टी (latrine) खाकर गांव की गंदगी साफ़ करता है।
निंदक के बारे में सत्य कथा:-
बहुत समय पहले की बात है। एक नगरी के राजा ने कुछ ब्राह्मणों को भोजन पर बुलाया। जब ब्राह्मण अपना भोजन भंडारा (तैयार) कर रहे थे। उसी समय आसमान में एक गिद्ध सर्प को लेकर उड़ रहा था, सर्प के मुख से जहर की बुँदे बन रहे भोजन में गिर गई। जिसके खाने से ब्राह्मणों की मौत हो गई ब्राह्मणों के मारने में न राजा की नियत थी, न सर्प की और न गिद्ध की। धर्मराज जी के सामने ये समस्या खड़ी हो गई। इन हत्याओ का दोष किस पर लगाये।
इनमे से कोई भी दोषी नहीं है। इस समस्या को दुर करने के लिए धर्मराज स्वयं उस नगरी में पहुँच गए और लोगों से पूछने लगे, तभी एक व्यक्ति जो राजा से ईर्ष्या रखता था, धर्मराज को बताने लगा इस नगरी का राजा बड़ा ही दुष्ट व अत्याचारी है इसी ने ब्राह्मणों को जहर देकर मारा है, धर्मराज जी बोले, मेरी समस्या हल हो गई। इन ब्राह्मणों की हत्या का दोष इस निंदक(निंदा करने वाले) के ऊपर लगेगा।
निंदा कई प्रकार की होती है कुछ लोगो को पता नहीं होता कि मैं निंदा कर रहा हूँ जैसे कुछ आदमी किसी राजनेता व राजनेतिक पार्टीयां की निंदा करके कर्म बिगाड़ रहे है। कुछ जातियों की निंदा करते है, कुछ किसी कंपनी के सामान की निंदा करते है, कुछ एक भक्त अपने गुरु महाराज के द्वारा बनाये गए कोऑर्डिनेटर भक्तो की निंदा करके पाप के भागी बन रहे है। कुछ साहेब की वाणी का गलत अर्थ निकाल कर पाप इक्कठा कर रहे है।
एक भक्त को व्हाट्सएप्प पर लिखकर भेजने का जूनून चढ़ा हुआ है।
साहेब की वाणी का गलत अर्थ निकाल कर लिखता है। साहेब ने सत्य बोलने को कहा है। संगत को सत से अवगत कराऊंगा वह एक वाणी का भी अर्थ नहीं कर सकता।
ओमकार तो निश्चय भया या को कर्ता मत जान।
साचा शब्द् कबीर का, परदे माये पहचान।।
साहेब की वाणी सच्चे नाम को जानने का इशारा करती है, न कि किसी सिस्टम व व्यक्ति विशेष की निंदा करने को कहती है। वह भक्त उपरोक्त वाणी की आड़ लेकर गलत प्रचार करके अपने कर्म बिगाड़ रहा है। वह व्यक्ति दान सेवा के बारे में गुरु महाराज के प्रवचनों का गलत अर्थ निकालकर संगत को गुमराह कर रहा है। व्हाट्सएप्प पर लिखकर भेजा है, सतगुरु महाराज दान सेवा के बारे में बताते हैं। आपका पैसा(दान) कहाँ गया है और कहाँ लगा है। उसका आखिर तक पीछा करो जबकि सतगुरु महाराज जी कहते है अगर दान बाये हाथ से दिया है तो दैहिने हाथ को पता नही लगना चाहिए। अगर अपने दान सेवा के नाम के पैसे घर में रख दिए है और संकल्प किया है ये पैसे गुरु जी को दुँगा और वे पैसे चोरी हो गए है तो भी आपका दान समझो लग गया। आगे सतगुरु जी कहते है यदि अपने दान का पैसा मुझे दे दिया और मैंने आपके सामने उन पैसों में आग लगाकर जला दिया, आपके मन में ये विचार आ गया कि मेरे पैसों को क्यों जला दिया तो आपका दान देना व्यर्थ है। जो पैसा सतगुरु जी को दान कर दिया वह आपका नहीं रहता है वह मालिक का होता है। वे इस पैसों को जहाँ मर्जी खर्च करे या किसी दूसरे को आदेश देकर खर्च करवाये दान देकर भक्त को निश्चिन्त हो जाना चाहिए। और ये मानना चाहिए कि मेरे पैसे उस सच्चे बैंक में जमा हो गए है, जो कभी भी धोखा नही देता और न ही कभी भगवान का बैंक फ़ैल होता है। कबीर साहेब की अमृत वाणी में :-
कबीर कमाई आपनी कबहू न निष्फल जाये। साथ समुन्दर आड़े पड़े, मिले अगाऊ आये।।
अपने दान सतगुरु जी को भारत में दे दिया और आपका जन्म सात समुन्दर पार अमेरिका में होता है तो भी आपकी दान सेवा सिमरण की कमाई आगे तैयार मिलेगी हम सभी अपने पैसों को सरकारी या गैर-सरकारी बैंक में जमा करके उनकी रखवाली नहीं करते और न ही बैंक अधिकारीयों व कर्मचारियों को निर्देश करते है कि मेरे पैसों को किसी डिफॉल्टर को मत देना व पैसों की देखभाल अच्छे से करना।
जबकि ये बैंक कभी भी फ़ैल हो सकते है और पहले बहुत से बैंक आर्थिक मंदी की वजह से फ़ैल हो चुके है। उन हालात में बैंक में जमा धन किसी को नहीं मिलता।
अतः उन भक्तो से हाथ जोड़कर विनती है जो गलत मैसेज संगत को दे रहे है उन्हें कृपा बंद करे। किसी भी शुभ कर्म को करने में बहुत समय व् ताकत लग जाती है और ना समझी से जीव एक पल में नष्ट कर लेता है फिर पश्चाताप के सिवाय कुछ हाथ नही आता है।
सतगुरु जी बार-बार सन्देश भेज कर कहते है कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है यानी सब करके रखा हुआ है आप निष्काम भाव से सेवा करके अपने पुण्य कर्म बनाते रहो। सारा विशव कबीर साहेब की भक्ति करेगा और सब सेवादारो का ऋणी रहेगा।
सत् साहिब।🙏🏻🙏🏻🙏🏻
सतगुरु देव जी को कोटि-कोटि प्रणाम ।
सभी भक्त आत्माओं को सत् साहेब।
सतगुरु देव जी का अंदर जेल से बार-बार एक ही सन्देश आता है। सभी भक्त मिल-जुल कर सेवा करें, प्रेम से रहे और नियम मर्यादा में रह कर अपनी भक्ति करते रहे।
यह समय बड़ा ही अनमोल है व लंबे समय के बाद आया है। इसको व्यर्थ न गवाए। अगर अबकी बार चूक गए तो सदा-सदा के लिए पछताना पड़ेगा, सतगुरु गरीब दास जी ने अपनी अमृत वाणी में बोला है-
कल्प कोटि युग बितिया, हम आये तिस बेर। गरीब दास जुलाहा कहै, देने भक्ति की टेर।।
गरीब दास जी महाराज उपरोक्त वाणी में समझा रहे है, यह भक्ति मुक्ति का समय एक करोड़ कल्प युग के बाद मिला है।
चारों युग सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग (जिनकी आयु 4320000 वर्ष )है, जब ये चारों युग2016 बार बीत जाते है। तब एक कल्प कहलाता है। ऐसे करोड़ कल्प के बाद कबीर परमेश्वर जी हमें काल के जाल से निकालने के लिए सतयुग से आने प्रारंभ हुए है। आप सभी भक्तों ने सतगुरु रामपाल जी के अमृत वचनों में सुना है। काल ने सतयुग में साहेब कबीर से वचन मांगे थे, तीन युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर) में थोड़े जीव छुड़ा कर सतलोक ले जाना, जब कलयुग आये जितने जीव मर्ज़ी ले जाना।
बंदी छोड़ कबीर साहेब जी जब 600 वर्ष पहले आये थे तब उपर काल से भेंट हुई तो काल ने कहा था कि जाओ ज्ञानी नीचे, वहाँ आपकी कोई नही सुनेगा, मैंने सभी जीवों को भर्मित कर दिया है सब आपका विरोध करेंगे, ऐसा ही हुआ तब साहेब ने काल से इस समय के लिए बोला था कि अपना संत भेजुंगा जो उनसे उपदेश लेकर मर्यादा में रह कर भक्ति करेगा वह संत सब को सतलोक लेकर जायेगा।
तब कबीर साहेब से काल ने कहा था आप एक संत भेजोगे, उससे पहले अनेक संत भेज कर सभी को भर्मित कर दुंगा, एक आत्मा को भी पार नहीं होने दुंगा और जीवों को नाना विधि से भर्मित करके अपने जाल में फंसा के रखूँगा।
करोड़ कल्प से पहले कबीर साहेब जी 70 युग लगातार काल के इस लोक में भक्ति मार्ग बताने के लिए आते रहे, एक भी जीव सतलोक में नहीं गया। हमने जो भी दान, सेवा, सिमरण किया उसका फल साथ-साथ मांगते गए और खाली होकर यहीं लख चौरासी में जाते रहे और काल जाल में फंस के रह गए।
गरीब, सत्तर युग हमने ज्ञान दिया, जीव न समझा एक।
घरि-घरि फिरे धरे कबीरा भेख।।
काल का जाल न-1, नाम खंड करवाना
न-2, काम, क्रोध, मोह, अंहकार में उतावले रखना।
न-3, मान बड़ाई, न-4, राग-द्वेष पैदा करना
न-5, दान, पुण्य सेवा से दूर करना
न-6, निंदा
न-7, श्राप
न-8, वरदान मांगना आदि।
वैसे तो उपरोक्त सभी विकार भक्ति मुक्ति में बाधा होते है परन्तु सबसे ज्यादा बाधक निंदक(निंदा करने वाला) गुरु द्रोही व आन उपासना हैं।
निंदा की हानि:- कबीर साहेब की वाणी
1- तिनका कबहु न निंदिये, पैरो तले होये।
उड़ आँख गिर जाये, पीर घनेरी होये।।
2- एक निंदक के सिर पर हज़ार पापी का भार बिना मतलब ठाये, दुनिया की बेगार।
3- निंदक नेड़े रखिये, आँगन कुटी छवाय।
भजन पानी बिन साबुन के, निर्मल करे स्वभाव।।
4 - निंदकमेरा मत मरो, मुझसे बसो न दूर।
गंदगी साफ़ किया करे, गाँव गोरवे सुवर।।
वाणी न-2 का भावार्थ
अगर घास का छोटा-सा टुकडा आपके पाँव के नीचे पड़ा हुआ है, उसकी भी निंदा नही करनी चाहिये यदि वह टुकड़ा हवा में उड़ कर आपकी आँख में गिर जाये तो बहुत पीड़ा होगी।
वाणी न- 2= निंदा करने वाले पर उतना ही पाप लगता है, जितना पाप एक हज़ार पापी सारी जिंदगी में पाप करते है और निंदक बिना वजह के निंदा करके अपने ऊपर पापों का भार ओढ़ लेता है
वाणी न-3 कबीर साहेब कहते है कि निंदा करने वाले की कुटिया अपने घर के आँगन में बना दो ताकि वह आपकी निंदा करके आपके पाप कर्म अपने सिर पर लेता रहे और आप बिना साबुन व पानी के निर्मल हो जाये।
वाणी न-4
मेरे निंदक की मौत नहीं होनी चाहिएऔर न ही मेरे घर से दूर होना चाहिये ताकि मेरी बुराई करके मेरे पाप कर्मो को साफ़ कर दे जैसे सुवर टट्टी (latrine) खाकर गांव की गंदगी साफ़ करता है।
निंदक के बारे में सत्य कथा:-
बहुत समय पहले की बात है। एक नगरी के राजा ने कुछ ब्राह्मणों को भोजन पर बुलाया। जब ब्राह्मण अपना भोजन भंडारा (तैयार) कर रहे थे। उसी समय आसमान में एक गिद्ध सर्प को लेकर उड़ रहा था, सर्प के मुख से जहर की बुँदे बन रहे भोजन में गिर गई। जिसके खाने से ब्राह्मणों की मौत हो गई ब्राह्मणों के मारने में न राजा की नियत थी, न सर्प की और न गिद्ध की। धर्मराज जी के सामने ये समस्या खड़ी हो गई। इन हत्याओ का दोष किस पर लगाये।
इनमे से कोई भी दोषी नहीं है। इस समस्या को दुर करने के लिए धर्मराज स्वयं उस नगरी में पहुँच गए और लोगों से पूछने लगे, तभी एक व्यक्ति जो राजा से ईर्ष्या रखता था, धर्मराज को बताने लगा इस नगरी का राजा बड़ा ही दुष्ट व अत्याचारी है इसी ने ब्राह्मणों को जहर देकर मारा है, धर्मराज जी बोले, मेरी समस्या हल हो गई। इन ब्राह्मणों की हत्या का दोष इस निंदक(निंदा करने वाले) के ऊपर लगेगा।
निंदा कई प्रकार की होती है कुछ लोगो को पता नहीं होता कि मैं निंदा कर रहा हूँ जैसे कुछ आदमी किसी राजनेता व राजनेतिक पार्टीयां की निंदा करके कर्म बिगाड़ रहे है। कुछ जातियों की निंदा करते है, कुछ किसी कंपनी के सामान की निंदा करते है, कुछ एक भक्त अपने गुरु महाराज के द्वारा बनाये गए कोऑर्डिनेटर भक्तो की निंदा करके पाप के भागी बन रहे है। कुछ साहेब की वाणी का गलत अर्थ निकाल कर पाप इक्कठा कर रहे है।
एक भक्त को व्हाट्सएप्प पर लिखकर भेजने का जूनून चढ़ा हुआ है।
साहेब की वाणी का गलत अर्थ निकाल कर लिखता है। साहेब ने सत्य बोलने को कहा है। संगत को सत से अवगत कराऊंगा वह एक वाणी का भी अर्थ नहीं कर सकता।
ओमकार तो निश्चय भया या को कर्ता मत जान।
साचा शब्द् कबीर का, परदे माये पहचान।।
साहेब की वाणी सच्चे नाम को जानने का इशारा करती है, न कि किसी सिस्टम व व्यक्ति विशेष की निंदा करने को कहती है। वह भक्त उपरोक्त वाणी की आड़ लेकर गलत प्रचार करके अपने कर्म बिगाड़ रहा है। वह व्यक्ति दान सेवा के बारे में गुरु महाराज के प्रवचनों का गलत अर्थ निकालकर संगत को गुमराह कर रहा है। व्हाट्सएप्प पर लिखकर भेजा है, सतगुरु महाराज दान सेवा के बारे में बताते हैं। आपका पैसा(दान) कहाँ गया है और कहाँ लगा है। उसका आखिर तक पीछा करो जबकि सतगुरु महाराज जी कहते है अगर दान बाये हाथ से दिया है तो दैहिने हाथ को पता नही लगना चाहिए। अगर अपने दान सेवा के नाम के पैसे घर में रख दिए है और संकल्प किया है ये पैसे गुरु जी को दुँगा और वे पैसे चोरी हो गए है तो भी आपका दान समझो लग गया। आगे सतगुरु जी कहते है यदि अपने दान का पैसा मुझे दे दिया और मैंने आपके सामने उन पैसों में आग लगाकर जला दिया, आपके मन में ये विचार आ गया कि मेरे पैसों को क्यों जला दिया तो आपका दान देना व्यर्थ है। जो पैसा सतगुरु जी को दान कर दिया वह आपका नहीं रहता है वह मालिक का होता है। वे इस पैसों को जहाँ मर्जी खर्च करे या किसी दूसरे को आदेश देकर खर्च करवाये दान देकर भक्त को निश्चिन्त हो जाना चाहिए। और ये मानना चाहिए कि मेरे पैसे उस सच्चे बैंक में जमा हो गए है, जो कभी भी धोखा नही देता और न ही कभी भगवान का बैंक फ़ैल होता है। कबीर साहेब की अमृत वाणी में :-
कबीर कमाई आपनी कबहू न निष्फल जाये। साथ समुन्दर आड़े पड़े, मिले अगाऊ आये।।
अपने दान सतगुरु जी को भारत में दे दिया और आपका जन्म सात समुन्दर पार अमेरिका में होता है तो भी आपकी दान सेवा सिमरण की कमाई आगे तैयार मिलेगी हम सभी अपने पैसों को सरकारी या गैर-सरकारी बैंक में जमा करके उनकी रखवाली नहीं करते और न ही बैंक अधिकारीयों व कर्मचारियों को निर्देश करते है कि मेरे पैसों को किसी डिफॉल्टर को मत देना व पैसों की देखभाल अच्छे से करना।
जबकि ये बैंक कभी भी फ़ैल हो सकते है और पहले बहुत से बैंक आर्थिक मंदी की वजह से फ़ैल हो चुके है। उन हालात में बैंक में जमा धन किसी को नहीं मिलता।
अतः उन भक्तो से हाथ जोड़कर विनती है जो गलत मैसेज संगत को दे रहे है उन्हें कृपा बंद करे। किसी भी शुभ कर्म को करने में बहुत समय व् ताकत लग जाती है और ना समझी से जीव एक पल में नष्ट कर लेता है फिर पश्चाताप के सिवाय कुछ हाथ नही आता है।
सतगुरु जी बार-बार सन्देश भेज कर कहते है कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है यानी सब करके रखा हुआ है आप निष्काम भाव से सेवा करके अपने पुण्य कर्म बनाते रहो। सारा विशव कबीर साहेब की भक्ति करेगा और सब सेवादारो का ऋणी रहेगा।
सत् साहिब।🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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