सत भक्ति से रोगों का निवारण
अनोखी_कहानियां
(जीने की राह बताने वाली)
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‘‘चोर कभी धनी नहीं होता"*
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कबीर परमेश्वर जी अपने विधानानुसार एक नगर के बाहर जंगल में आश्रम बनाकर रहते थे। कुछ दिन आश्रम में रहते थे, सत्संग करते थे। फिर भ्रमण के लिए निकल जाते थे। उनका एक जाट किसान शिष्य था जो कुछ ही महीनों से शिष्य बना था। किसान निर्धन था। उसके पास एक बैल था। उसी से किसी अन्य किसान के साथ मेल-जोल करके खेती करता था। दो दिन अन्य का बैल स्वयं लेकर दोनों बैलों से हल चलाता था। फिर दो दिन दूसरा किसान उसका बैल लेकर अपने बैल के साथ जोड़कर हल जोतता था। किसान अपने कच्चे मकान के आँगन में बैल को बाँधता था। एक रात्रि में चोर ने उस किसान के बैल को चुरा लिया। किसान ने देखा कि बैल चोरी हो गया तो सुबह वह आश्रम में गया। गुरूदेव जी से अपना दुःख सांझा किया। गुरूदेव जी ने कहा कि बेटा! विश्वास रख परमात्मा पर, दान-धर्म-भक्ति करता रह, आपको परमात्मा दो बैल देगा। जो चुराकर ले गया है, वह पाप का भागी बना है। परमेश्वर की कृपा से बारिश अच्छी हुई। किसान भक्त की फसल चौगुनी हुई। भक्त किसान ने दो बैल मोल लिये और उनको अच्छी खुराक खिलाई। बैल खागड़ों (सांडों) जैसे ताकतवर हो गए। गाँव में उसके बैलों की चर्चा होती थी। एक वर्ष पश्चात् वही चोर उसी क्षेत्रा में चोरी करने आया। कहीं दाँव नहीं लगा। उसने विचार किया कि जिसका बैल चुराया था, उसके घर देखता हूँ, हो सकता है कोई बैल ले आया हो। देखा तो दो बैल खागड़ों जैसे बँधे थे। चोर ने दोनों चुरा लिए। किसान जागा तो बैल चोरी हो चुके थे। गुरू जी से बताया तो गुरू जी ने कहा कि बेटा! तेरे घर चार बैल देगा भगवान। चोर कभी सेठ नहीं हो सकता। पाप-पाप इकट्ठे करता है। रजा परमात्मा की, आशीर्वाद गुरूदेव का, बारिश ने किसानों की मौज कर दी। भक्त किसान के पास जमीन पर्याप्त थी, परंतु बारिश के अभाव से खेती थोड़े क्षेत्रा में करता था। बारिश अच्छी हो गई। दो बैल मोल लिए, दो कर्जे पर लिए, खेती अधिक जमीन में की। एक नौकर हाली रखा। एक वर्ष में सब कर्ज भी उतर गया। बैल चार हो गए खागड़ों जैसे मोटे-मोटे, तगड़े-तगड़े। मकान भी पक्का बना लिया। चोर दो वर्ष के पश्चात् उधर गया और पहले उसी किसान की स्थिति देखने गया। चोर ने देखा कि चार बैल सांडों जैसे बैठे थे और चोर के पास दो दिन का आटा शेष था। अधिक निर्धन हो गया था।
चोर ने किसान को रात्रि में नींद से उठाया तो किसान बोला, कौन हो आप? चोर ने कहा कि मैं चोर हूँ जिसने तेरे तीन बैल चुराए थे। किसान बोला, भाई! मेरी नींद खराब ना कर, तू अपना काम कर। परमात्मा अपना कर रहा है, मुझे सोने दे। चोर ने पैर पकड़ लिए और बोला, हे देवता! मेरे से अब चोरी नहीं हो रही। एक बात बता, आपका चोर आपके सामने खड़ा है, आप पकड़ भी नहीं रहे हो। हे भाई! तेरा एक बैल मैंने चुराया, तेरे घर अगले वर्ष दो बैल खागड़ों जैसे बँधे थे, वे दोनों भी मैं चुरा ले गया। आज दो वर्ष पश्चात् आपके आँगन में चार बैल खागड़ों जैसे बँधे हैं। मेरा सर्वनाश हो चुका है। बालक भी भूखे रहते हैं। मुझे मार चाहे छोड़, मुझे तेरे विकास का राज बता। मैं भी जाट किसान हूँ, जमीन भी है। निर्धनता बेअन्त है। भक्त किसान ने उसको कहा कि आप स्नान करो, खाना खाओ। चोर ने वैसा ही किया। फिर भक्त उस चोर को आश्रम में लेकर गया। गुरूदेव से सब घटना बताई। गुरू देव ने चोर को समझाया। सात-आठ दिन भक्त किसान ने अपने घर पर रखा और प्रतिदिन गुरू जी से मिलाकर सत्संग सुनाया। चोर ने दीक्षा ली। गुरू जी ने कहा कि भक्त बेटा! नए भक्त को एक बैल दे दे उधारा। खेती करेगा, तेरे पैसे लौटा देगा। भक्त ने कहा, गुरूजी! ठीक है। भक्त किसान ने नए भक्त को एक बैल दे दिया। नया भक्त प्रति महीना सत्संग में आता था। पूरे परिवार को नाम (दीक्षा) दिला दिया। दो वर्ष में वित्तीय स्थिति अच्छी हो गई। एक बैल $ तीन पहले वाले (चोरी वाले) बैलों के रूपये लेकर चोर भक्त उस किसान भक्त के घर आया। उसके बच्चे भी साथ थे। किसान भक्त से उस चोर भक्त ने सब पैसे देकर कहा कि मुझे क्षमा करना। आपका उपकार मेरी सात पीढ़ी भी नहीं उतार पाएगी। पुराना भक्त बोला कि हे भाई! यह सब गुरूदेव जी की कृपा है। उनका वचन फला है। आप यह सब रूपये गुरू जी को दान रूप में दो। मेरे को तो उन्होंने पहले ही कई गुणा बैलों की पूंजी दे दी थी। मेरे काम की नहीं। दोनों भक्त गुरू जी के पास गए और सर्व दान राशि चरणों में दख दी। गुरू जी ने भोजन-भण्डारा (लंगर) में लगा दी, सत्संग किया। इस प्रकार चोरी का धन मोरी में जाता है। भक्त सदा फलता-फूलता है।
👉‘‘संस्कार छूत के रोग की तरह फैलते हैं’’ :-
अच्छे तथा बुरे संस्कार संक्रमण रोग की तरह फैलते हैं जैसे भक्त के हाथ से बोये गए बीज में भी भक्ति संस्कार प्रवेश होते हैं। जो उस अन्न को खाता है, उसमें भी भक्ति की प्रेरणा होती है।
पूरे गुरू की क्या पहचान है?
प्रश्न :- पूरे गुरू की क्या पहचान है? हम तो जिस भी सन्त से ज्ञान सुनते हैं, वह पूर्ण सतगुरू लगता है।
उत्तर :- सूक्ष्मवेद में गुरू के लक्षण बताए हैं :-
गरीब, सतगुरू के लक्षण कहूँ, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद छः शास्त्रा, कह अठारह बोध।।
सन्त गरीबदास जी (गाँव-छुड़ानी जिला-झज्जर, हरियाणा) को परमेश्वर कबीर जी मिले थे। उनकी आत्मा को ऊपर अपने सत्यलोक (सनातन परम धाम) में लेकर गए थे। ऊपर के सर्व लोकों का अवलोकन कराकर वापिस पृथ्वी पर छोड़ा था। उनको सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान बताया था। उनका ज्ञानयोग परमेश्वर कबीर जी ने खोला था। उसके आधार से सन्त गरीबदास जी ने गुरू की पहचान बताई है कि जो सच्चा गुरू अर्थात् सतगुरू होगा, वह ऐसा ज्ञान बताता है कि उसके वचन आत्मा को आनन्दित कर देते हैं, बहुत मधुर लगते हैं क्योंकि वे सत्य पर आधारित होते हैं। कारण है कि सतगुरू चार वेदों तथा सर्व शास्त्रों का ज्ञान विस्तार से कहता है।
यही प्रमाण परमेश्वर कबीर जी ने सूक्ष्मवेद में कबीर सागर के अध्याय ‘‘जीव धर्म बोध‘‘ में पृष्ठ 1960 पर दिया है” :-
गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।।
दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।।
चौथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा।।
सरलार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं :-
1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।
2. दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी
और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।
3. तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है,
भेदभाव नहीं रखता।
4. चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों (चार वेद तो सर्व जानते 2. ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरूष :- यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का प्रभु है। यह भी सर्वव्यापी अर्थात् वासुदेव नहीं है।
3. अक्षर पुरूष :- यह केवल 7 शंख ब्रह्माण्डों का प्रभु है, यह भी सर्वव्यापी अर्थात् वासुदेव नहीं है।
4. परम अक्षर ब्रह्म :- यह सर्व ब्रह्माण्डों का स्वामी है, सर्व का धारण-पोषण करने वाला है, यह वासुदेव है।
विशेष :- अधिक जानकारी के लिए पढ़ें इसी पुस्तक के “सृष्टि रचना” अध्याय में।
जैसा कि आप जी को पूर्व में बताया है कि परम अक्षर ब्रह्म स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अच्छी आत्माओं को मिलते हैं। उनको तत्वज्ञान बताते हैं। इसी विधानानुसार वही परमात्मा सन्त गरीबदास जी को (गाँव = छुड़ानी, जिला-झज्जर, प्रांत-हरियाणा) सन् 1727 में मिले थे। एक जिन्दा महात्मा की वेशभूषा में थे। गरीब दास जी की आत्मा को उस सनातन परम धाम में ले गए थे। फिर ऊपर के सर्व ब्रह्माण्डों तथा प्रभुओं की स्थिति बताकर तत्वज्ञान से परीचित कराकर वापिस शरीर में छोड़ा था। उस समय सन्त गरीब दास जी की आयु 10 वर्ष थी। उस दिन सन्त गरीबदास जी को मृत जानकर चिता पर रखकर अन्तिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। उसी समय उनकी आत्मा को शरीर में प्रवेश करा दिया। जीवित होने पर सर्व कुल के लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसके पश्चात् सन्त गरीबदास जी ने एक अनमोल ग्रन्थ की रचना की। उसमें आँखों देखा तथा स्वयं परमात्मा द्वारा बताए ज्ञान को बताया जो एक गोपाल दास नामक दादू पंथी साधु ने लिखा था। जो वर्तमान में प्रिंट करा रखा है।
पंजाब प्रान्त में लुधियाना शहर के पास एक वासीयर गाँव है। उसमें एक प्रभु प्रेमी व्यक्ति रामराय उर्फ झूमकरा रहता था। उसने सन्त गरीब दास जी की महिमा सुनी तो दर्शनार्थ गाँव छुड़ानी में चला आया। सन्त गरीबदास जी ने यह ज्ञान सुनाया जो इस दास (संत रामपाल दास) को सन्त गरीब दास से प्राप्त हुआ है जो आप जी को इस पुस्तक तथा अन्य पुस्तकों के द्वारा सुनाया है।
उस रामराय ने प्रश्न किया कि हे महात्मा जी! यह ज्ञान तो आज तक किसी ने नहीं बताया। सन्त गरीब दास जी ने वाणी के द्वारा बताया। कोट्यों मध्य कोई नहीं राई झूमकरा, अरबों में कोई गरक सुनो राई झूमकरा।।
अनुवाद व भावार्थ :- सन्त गरीबदास जी ने बताया कि यह ज्ञान करोड़ों में किसी के पास नहीं मिलेगा, अरबों में किसी एक के पास मिलेगा। वह संत सर्व ज्ञान सम्पन्न सम्पूर्ण साधना के मन्त्रों से गरक अर्थात् परिपूर्ण होता है। प्रिय पाठको! वह संत वर्तमान में बरवाला जिला-हिसार वाला है। ज्ञान समझो और लाभ उठाओ।
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आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे।
संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।
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(जीने की राह बताने वाली)
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‘‘चोर कभी धनी नहीं होता"*
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कबीर परमेश्वर जी अपने विधानानुसार एक नगर के बाहर जंगल में आश्रम बनाकर रहते थे। कुछ दिन आश्रम में रहते थे, सत्संग करते थे। फिर भ्रमण के लिए निकल जाते थे। उनका एक जाट किसान शिष्य था जो कुछ ही महीनों से शिष्य बना था। किसान निर्धन था। उसके पास एक बैल था। उसी से किसी अन्य किसान के साथ मेल-जोल करके खेती करता था। दो दिन अन्य का बैल स्वयं लेकर दोनों बैलों से हल चलाता था। फिर दो दिन दूसरा किसान उसका बैल लेकर अपने बैल के साथ जोड़कर हल जोतता था। किसान अपने कच्चे मकान के आँगन में बैल को बाँधता था। एक रात्रि में चोर ने उस किसान के बैल को चुरा लिया। किसान ने देखा कि बैल चोरी हो गया तो सुबह वह आश्रम में गया। गुरूदेव जी से अपना दुःख सांझा किया। गुरूदेव जी ने कहा कि बेटा! विश्वास रख परमात्मा पर, दान-धर्म-भक्ति करता रह, आपको परमात्मा दो बैल देगा। जो चुराकर ले गया है, वह पाप का भागी बना है। परमेश्वर की कृपा से बारिश अच्छी हुई। किसान भक्त की फसल चौगुनी हुई। भक्त किसान ने दो बैल मोल लिये और उनको अच्छी खुराक खिलाई। बैल खागड़ों (सांडों) जैसे ताकतवर हो गए। गाँव में उसके बैलों की चर्चा होती थी। एक वर्ष पश्चात् वही चोर उसी क्षेत्रा में चोरी करने आया। कहीं दाँव नहीं लगा। उसने विचार किया कि जिसका बैल चुराया था, उसके घर देखता हूँ, हो सकता है कोई बैल ले आया हो। देखा तो दो बैल खागड़ों जैसे बँधे थे। चोर ने दोनों चुरा लिए। किसान जागा तो बैल चोरी हो चुके थे। गुरू जी से बताया तो गुरू जी ने कहा कि बेटा! तेरे घर चार बैल देगा भगवान। चोर कभी सेठ नहीं हो सकता। पाप-पाप इकट्ठे करता है। रजा परमात्मा की, आशीर्वाद गुरूदेव का, बारिश ने किसानों की मौज कर दी। भक्त किसान के पास जमीन पर्याप्त थी, परंतु बारिश के अभाव से खेती थोड़े क्षेत्रा में करता था। बारिश अच्छी हो गई। दो बैल मोल लिए, दो कर्जे पर लिए, खेती अधिक जमीन में की। एक नौकर हाली रखा। एक वर्ष में सब कर्ज भी उतर गया। बैल चार हो गए खागड़ों जैसे मोटे-मोटे, तगड़े-तगड़े। मकान भी पक्का बना लिया। चोर दो वर्ष के पश्चात् उधर गया और पहले उसी किसान की स्थिति देखने गया। चोर ने देखा कि चार बैल सांडों जैसे बैठे थे और चोर के पास दो दिन का आटा शेष था। अधिक निर्धन हो गया था।
चोर ने किसान को रात्रि में नींद से उठाया तो किसान बोला, कौन हो आप? चोर ने कहा कि मैं चोर हूँ जिसने तेरे तीन बैल चुराए थे। किसान बोला, भाई! मेरी नींद खराब ना कर, तू अपना काम कर। परमात्मा अपना कर रहा है, मुझे सोने दे। चोर ने पैर पकड़ लिए और बोला, हे देवता! मेरे से अब चोरी नहीं हो रही। एक बात बता, आपका चोर आपके सामने खड़ा है, आप पकड़ भी नहीं रहे हो। हे भाई! तेरा एक बैल मैंने चुराया, तेरे घर अगले वर्ष दो बैल खागड़ों जैसे बँधे थे, वे दोनों भी मैं चुरा ले गया। आज दो वर्ष पश्चात् आपके आँगन में चार बैल खागड़ों जैसे बँधे हैं। मेरा सर्वनाश हो चुका है। बालक भी भूखे रहते हैं। मुझे मार चाहे छोड़, मुझे तेरे विकास का राज बता। मैं भी जाट किसान हूँ, जमीन भी है। निर्धनता बेअन्त है। भक्त किसान ने उसको कहा कि आप स्नान करो, खाना खाओ। चोर ने वैसा ही किया। फिर भक्त उस चोर को आश्रम में लेकर गया। गुरूदेव से सब घटना बताई। गुरू देव ने चोर को समझाया। सात-आठ दिन भक्त किसान ने अपने घर पर रखा और प्रतिदिन गुरू जी से मिलाकर सत्संग सुनाया। चोर ने दीक्षा ली। गुरू जी ने कहा कि भक्त बेटा! नए भक्त को एक बैल दे दे उधारा। खेती करेगा, तेरे पैसे लौटा देगा। भक्त ने कहा, गुरूजी! ठीक है। भक्त किसान ने नए भक्त को एक बैल दे दिया। नया भक्त प्रति महीना सत्संग में आता था। पूरे परिवार को नाम (दीक्षा) दिला दिया। दो वर्ष में वित्तीय स्थिति अच्छी हो गई। एक बैल $ तीन पहले वाले (चोरी वाले) बैलों के रूपये लेकर चोर भक्त उस किसान भक्त के घर आया। उसके बच्चे भी साथ थे। किसान भक्त से उस चोर भक्त ने सब पैसे देकर कहा कि मुझे क्षमा करना। आपका उपकार मेरी सात पीढ़ी भी नहीं उतार पाएगी। पुराना भक्त बोला कि हे भाई! यह सब गुरूदेव जी की कृपा है। उनका वचन फला है। आप यह सब रूपये गुरू जी को दान रूप में दो। मेरे को तो उन्होंने पहले ही कई गुणा बैलों की पूंजी दे दी थी। मेरे काम की नहीं। दोनों भक्त गुरू जी के पास गए और सर्व दान राशि चरणों में दख दी। गुरू जी ने भोजन-भण्डारा (लंगर) में लगा दी, सत्संग किया। इस प्रकार चोरी का धन मोरी में जाता है। भक्त सदा फलता-फूलता है।
👉‘‘संस्कार छूत के रोग की तरह फैलते हैं’’ :-
अच्छे तथा बुरे संस्कार संक्रमण रोग की तरह फैलते हैं जैसे भक्त के हाथ से बोये गए बीज में भी भक्ति संस्कार प्रवेश होते हैं। जो उस अन्न को खाता है, उसमें भी भक्ति की प्रेरणा होती है।
पूरे गुरू की क्या पहचान है?
प्रश्न :- पूरे गुरू की क्या पहचान है? हम तो जिस भी सन्त से ज्ञान सुनते हैं, वह पूर्ण सतगुरू लगता है।
उत्तर :- सूक्ष्मवेद में गुरू के लक्षण बताए हैं :-
गरीब, सतगुरू के लक्षण कहूँ, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद छः शास्त्रा, कह अठारह बोध।।
सन्त गरीबदास जी (गाँव-छुड़ानी जिला-झज्जर, हरियाणा) को परमेश्वर कबीर जी मिले थे। उनकी आत्मा को ऊपर अपने सत्यलोक (सनातन परम धाम) में लेकर गए थे। ऊपर के सर्व लोकों का अवलोकन कराकर वापिस पृथ्वी पर छोड़ा था। उनको सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान बताया था। उनका ज्ञानयोग परमेश्वर कबीर जी ने खोला था। उसके आधार से सन्त गरीबदास जी ने गुरू की पहचान बताई है कि जो सच्चा गुरू अर्थात् सतगुरू होगा, वह ऐसा ज्ञान बताता है कि उसके वचन आत्मा को आनन्दित कर देते हैं, बहुत मधुर लगते हैं क्योंकि वे सत्य पर आधारित होते हैं। कारण है कि सतगुरू चार वेदों तथा सर्व शास्त्रों का ज्ञान विस्तार से कहता है।
यही प्रमाण परमेश्वर कबीर जी ने सूक्ष्मवेद में कबीर सागर के अध्याय ‘‘जीव धर्म बोध‘‘ में पृष्ठ 1960 पर दिया है” :-
गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।।
दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।।
चौथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा।।
सरलार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं :-
1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।
2. दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी
और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।
3. तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है,
भेदभाव नहीं रखता।
4. चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों (चार वेद तो सर्व जानते 2. ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरूष :- यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का प्रभु है। यह भी सर्वव्यापी अर्थात् वासुदेव नहीं है।
3. अक्षर पुरूष :- यह केवल 7 शंख ब्रह्माण्डों का प्रभु है, यह भी सर्वव्यापी अर्थात् वासुदेव नहीं है।
4. परम अक्षर ब्रह्म :- यह सर्व ब्रह्माण्डों का स्वामी है, सर्व का धारण-पोषण करने वाला है, यह वासुदेव है।
विशेष :- अधिक जानकारी के लिए पढ़ें इसी पुस्तक के “सृष्टि रचना” अध्याय में।
जैसा कि आप जी को पूर्व में बताया है कि परम अक्षर ब्रह्म स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अच्छी आत्माओं को मिलते हैं। उनको तत्वज्ञान बताते हैं। इसी विधानानुसार वही परमात्मा सन्त गरीबदास जी को (गाँव = छुड़ानी, जिला-झज्जर, प्रांत-हरियाणा) सन् 1727 में मिले थे। एक जिन्दा महात्मा की वेशभूषा में थे। गरीब दास जी की आत्मा को उस सनातन परम धाम में ले गए थे। फिर ऊपर के सर्व ब्रह्माण्डों तथा प्रभुओं की स्थिति बताकर तत्वज्ञान से परीचित कराकर वापिस शरीर में छोड़ा था। उस समय सन्त गरीब दास जी की आयु 10 वर्ष थी। उस दिन सन्त गरीबदास जी को मृत जानकर चिता पर रखकर अन्तिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। उसी समय उनकी आत्मा को शरीर में प्रवेश करा दिया। जीवित होने पर सर्व कुल के लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसके पश्चात् सन्त गरीबदास जी ने एक अनमोल ग्रन्थ की रचना की। उसमें आँखों देखा तथा स्वयं परमात्मा द्वारा बताए ज्ञान को बताया जो एक गोपाल दास नामक दादू पंथी साधु ने लिखा था। जो वर्तमान में प्रिंट करा रखा है।
पंजाब प्रान्त में लुधियाना शहर के पास एक वासीयर गाँव है। उसमें एक प्रभु प्रेमी व्यक्ति रामराय उर्फ झूमकरा रहता था। उसने सन्त गरीब दास जी की महिमा सुनी तो दर्शनार्थ गाँव छुड़ानी में चला आया। सन्त गरीबदास जी ने यह ज्ञान सुनाया जो इस दास (संत रामपाल दास) को सन्त गरीब दास से प्राप्त हुआ है जो आप जी को इस पुस्तक तथा अन्य पुस्तकों के द्वारा सुनाया है।
उस रामराय ने प्रश्न किया कि हे महात्मा जी! यह ज्ञान तो आज तक किसी ने नहीं बताया। सन्त गरीब दास जी ने वाणी के द्वारा बताया। कोट्यों मध्य कोई नहीं राई झूमकरा, अरबों में कोई गरक सुनो राई झूमकरा।।
अनुवाद व भावार्थ :- सन्त गरीबदास जी ने बताया कि यह ज्ञान करोड़ों में किसी के पास नहीं मिलेगा, अरबों में किसी एक के पास मिलेगा। वह संत सर्व ज्ञान सम्पन्न सम्पूर्ण साधना के मन्त्रों से गरक अर्थात् परिपूर्ण होता है। प्रिय पाठको! वह संत वर्तमान में बरवाला जिला-हिसार वाला है। ज्ञान समझो और लाभ उठाओ।
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Nice
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